रिश्ता
रिश्ता
न जाने कौन सा रिश्ता जुड़ा है मेरा तूझसे,
जो मुझे तेरी और खीचा ले आता है
न जाने कौन सा रिश्ता जुड़ा है मेरा तुझसे,
जो तेरे जाने के बाद भी ,
तेरी परछाई को महसूस करता हु.
वक़्त का आलम कुछ इस क़दर है ,
के लोग समझते नहीं अलफ़ाज़ मेरे,
एक तू थी जो मेरी ख़ामोशी भी जान जाती थी.
बहुत मजबूत है ,
ये नए रिश्ते पर क्या करूँ ,
मेरा दिल आज भी उस नाज़ुक से रिश्ते को ,
सँभालने में लग जाता हु.
न जाने कौन सा रिश्ता जुड़ा है मेरा तुझसे,
जो मुझे तेरी और खीचा ले आता है
बंद करना चाहता हु मैं ,
तेरी यादो की किताब को.
पर ना जाने
क्यों उस किताब को रोज़,
महसूस करने का जी चाहता है.
चाँद सी चमकती हुई ,
मेरी मोहब्बत को तू पहचान न पायी.
ये क्या किया तूने के,
मुझी को बदनाम कर दिया.
हां मैं अभी भी बेइंतेहा ,
मोहब्बत करता हु तुझसे.
हां मैं अभी भी बेइंतेहा ,
मोहब्बत करता हु तुझसे.
पर तू ये मत समझना की ,
अभी भी तेरा इंतज़ार है मुझको.
क्योंकि उस इंसान को कबका ,
कत्ले-आम कर दिया है मैंने.
तू ये मत समझना की ,
अभी भी तेरा इंतज़ार है मुझको.
पर न जाने कौन सा रिश्ता जुड़ा है मेरा तुझसे,
जो मुझे तेरी और खीचा ले आता है.
- Harry Goswami
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