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रिश्ता

रिश्ता न जाने कौन सा रिश्ता जुड़ा है मेरा तूझसे, जो मुझे तेरी और खीचा ले आता है न जाने कौन सा रिश्ता जुड़ा है मेरा तुझसे,  जो तेरे जाने के बाद भी ,  तेरी परछाई को महसूस करता हु.    वक़्त का आलम कुछ इस क़दर है ,  के लोग समझते नहीं अलफ़ाज़ मेरे, एक तू थी जो मेरी ख़ामोशी भी जान जाती थी.  बहुत मजबूत है , ये नए रिश्ते पर क्या करूँ , मेरा दिल आज भी उस नाज़ुक से रिश्ते को , सँभालने में लग जाता हु. न जाने कौन सा रिश्ता जुड़ा है मेरा तुझसे, जो मुझे तेरी और खीचा ले आता है बंद करना चाहता हु मैं , तेरी यादो की किताब को. पर ना जाने  क्यों उस किताब को रोज़, महसूस करने का जी चाहता है. चाँद सी चमकती हुई , मेरी मोहब्बत को तू पहचान न पायी. ये क्या किया तूने के, मुझी को बदनाम कर दिया. हां मैं अभी भी बेइंतेहा , मोहब्बत करता हु तुझसे. हां मैं अभी भी बेइंतेहा , मोहब्बत करता हु तुझसे. पर तू ये मत समझना की , अभी भी तेरा इंतज़ार है मुझको. क्योंकि उस इंसान को कबका , कत्ले-आम कर दिया है मैंने.  तू ये मत समझना की , अभी भी तेरा इंतज़ार है मुझको. पर न जाने कौन सा रिश्ता जुड़ा है मेरा त...